‘जल, जंगल, जमीन सब सूख रहे हैं, ऐसे में आदमी भला क्यों नहीं सूखेगा!’

नई दिल्ली: शांति देवेंद्र खरे जी की अध्यक्षता में ‘एकेडमी ऑफ फ़ाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर’ का मासिक काव्य आयोजन ‘डायलॉग’ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस बार की काव्य गोष्ठी गज़लों व नवगीतों पर आधारित थी जिसमें विनोद सिन्हा, जगदीश पंकज, मानव रत्ती, अमिताभ खरे और पंडित प्रेम बरेलवी जैसे सम्मानित गीतकारों, शायरों व कवियों के साथ विशिष्ट अतिथि के रूप में विनोद कुमार सोनकिया ने भाग लिया। कनाडा से आए अँग्रेजी के विदेशी युवा कवि मानव रत्ती ने अपनी अङ्ग्रेज़ी कविताओं से कार्यक्रम का आगाज किया जिसका अनुवाद मिथिलेश श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया। ‘पांडिचेरी’ शीर्षक से उन्होने चार कविताएं पढ़ीं जिनमें भारत की बहुरंगी संस्कृति से लेकर प्रकृति और अध्यात्म के कई पहलू गहराई से उजागर होते नजर आए। पंडित प्रेम बरेलवी, जगदीश पंकज और विनोद सिन्हा ने अपने नवगीतों व गज़लों की सुरमई प्रस्तुति करते हुए समाँ बांधा। अमिताभ खरे ने ‘गीत का गीत’ शीर्षक से प्रेम, प्रकृति, कोमलता और लय की पीड़ा को अपने नवगीतों के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत किया जबकि विनोद कुमार सोनकिया ने अपने काव्य के माध्यम से वर्तमान की जटिलताओं और विद्रूपताओं को नया स्वर प्रदान किया। सभी कवियों, शायरों व गीतकारों की प्रस्तुति में अपने समय की विडंबनाओ का स्वर सबसे प्रमुख रहा। उतरा हुआ है कील से ये वक़्त का पहिया (अमिताभ खरे),  जो तुम कहो बस वह सही (जगदीश पंकज), इस पार भी, उस पार भी (विनोद सिन्हा), ये हादसा भी मेरे साथ अबकी साल हुआ (विनोद कुमार सोनकिया) जैसे कई गीत दर्शकों की जुबान पर चढ़ते नजर आए।

कार्यक्रम के अध्यक्षीय भाषण में अपनी बात रखते हुए शांति देवेन्द्र खरे ने सभी काव्य प्रस्तुतियों को सराहा और गीतों, गज़लों और कविताओं की बढ़ती जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा कि आज ऐसे समय में जब नदियां, जल, जंगल, जमीन सब सूख रहे हैं, ऐसे में आदमी भला क्यों नहीं सूखेगा। उन्होने गीतों के समृद्ध इतिहास, परंपरा और विकास के चरणों पर भी विस्तार से बात की।

कार्यक्रम के दौरान शांति देवेंद्र खरे जी की पुस्तक ‘मानस कथा अमिय रस भींजी’ का भी लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य पूजा राधा तथा धन्यवाद ज्ञापन अविनाश मिश्र द्वारा प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा और संयोजन नीरज कुमार मिश्र ने किया। कार्यक्रम का संचालन युवा कवि अदनान काफिल दरवेश ने किया गया।

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