अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस विशेष : भारत में आत्महत्याओं की दर में 23 फीसदी की बढ़ोत्तरी

नई दिल्ली :

 

अगर आप अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल को हंसी में उड़ा रहे हैं या मजाक का हिस्सा मान रहे हैं तो जरा नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 पर गौर फरमाएं। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 के मुताबिक वर्ष 2000 से 2015 तक देश में आत्महत्याओं के दर में 23 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। हैरानी की बात ये है कि आत्महत्याओं के आधिकांश मामले 30 वर्ष से 45 आयु वर्ग का रहा जबकि 18 से 30 आयु वर्ग के लोग आत्महत्या के मामलों में दूसरे नंबर पर रहे।

 

वर्ष 2000 में 1,08, 593 दर्ज आत्महत्या के मामलों की तुलना में वर्ष 2015 में 1,33,623 लोगों ने आत्महत्या की जिसमें से तकरीबन 33 फीसदी (44, 593 मौत) 30 से 45 आयु वर्ग के लोग थे जबकि 18 से 30 वर्ष के आयु वर्ग में ये आंकड़ा तकरीबन 32.81 फीसदी यानि 43, 852 आत्महत्याओं का रहा। दोनों आयु वर्ग (18-45 वर्ष आयु वर्ग) को मिलाकर अगर देखें तो वर्ष 2015 में इस आयु वर्ग के तकरीबन 66 फीसदी लोगों ने आत्महत्या की। वर्ष 2015 में 14 वर्ष से कम आयु वर्ग के तकरीबन 1 फीसदी लोगों ने और 14-18 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में आत्महत्याओं का दर तकरीबन 6 फीसदी रही। कुल मामलों में तकरीबन 19 फीसदी 45 से 60 वर्ष आयु वर्ग के लोगों ने आत्महत्या की जबकि 60 वर्ष से उपर के आयु वर्ग में यह 7.77 फीसदी रही।

 

 

वर्ष 2005 में आत्महत्या के कुल मामले 1,13,914 रहा जबकि 2010 में यह बढ़कर 1,34,599 पर पहुंच गया। आंकड़े यह बताते हैं कि आत्महत्या के ज्यादातर मामले पुरूषों के रहे। वर्ष 2005 में 66,032 पुरूषों ने आत्महत्या की, वर्ष 2010 में यह आंकड़ा बढ़कर 87,180 पर पहुंचा और वर्ष 2015 में यह और बढ़कर 91,528 पर पहुंच गया। महिलाओं में वर्ष 2000-2015 तक इस आंकड़े में मामुली बढ़त देखी गई। ऐसे में जबकि देश के लोगों की औसत आयु फिलहाल 68 से 69 साल का है, आत्महत्या के ये आंकड़े चौंकाते हैं।

 

जानकार सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों, भेदभाव और नौकरियों में ज्यादा से ज्यादा सैलरी पाने की लालसा को युवाओं में बढ़ रही आत्महत्या के आंकड़ों के लिए जिम्मेदार मानते हैं। जानकार बताते हैं कि ऐसे समाज में इन आंकड़ों की गंभीरता तब और भी अधिक बढ़ जाती है जहां ऐसी प्रवृतियों को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ कर देखने का चलन थोड़ा कम हो।

 

भारत में हाल ही में मानसिक स्वास्थ्य नीति तैयार कर इन समस्याओं के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और इनके इलाज के बुनियादी ढ़ांचे को तैयार करने का काम प्राथमिकता के स्तर पर शुरू किया है।

 

ऐसे में मानसिक तनाव से मुक्ति की दिशा में योग जैसे विकल्प एक बेहतर समाज की दिशा में आगे बढ़ने में मदद तो कर ही सकते हैं।

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